Hindi Essay, Story on “Guruji, Lagi Lagao”, “गुरुजी, लंगी लगाओ” Hindi Kahavat for Class 6, 7, 8, 9, 10 and Class 12 Students.

गुरुजी, लंगी लगाओ

Guruji, Lagi Lagao

सावन का महीना, नागपंचमी का दिन। एक कस्बे में जबरदस्त दंगल का सामान था। जवार (आसपास) के नामी पहलवान जुटे थे। दर्शकों की बड़ी भीड़ थी। कश्तियां हो रही थीं। अखाड़े में कई जोड़ छूटे हुए थे। पास के एक गांव से बहुत से नवयुवक कुश्ती देखने आए थे। उनमें एक पचीस साल का नौजवान अहीर था। वह कभी अखाड़े में तो नहीं उतरा था, लेकिन कसरत का बड़ा शौकीन था। बदन उसका बड़ा अच्छा बना हुआ था। लम्बाई-चौड़ाई उसे पुश्तैनी मिली थी। बहुत ही मजबूत था। उसके साथियों ने कहा, “अरे रामदीन, आज साल-साल के दिन तुम भी अखाड़े में उतरकर लड़ने की सायत कर लो।” वह कुछ झेंपता-सा रहा। लेकिन उसके साथियों ने अखाड़े के सरदार पहलवान से जाकर कहा, “यह भी लड़ेंगे।”

उसने कहा, “अच्छा है आएं, अपना जोड़ चुन लें।”

नौजवान ने देखा कि सरदार पहलवान बरी तरह अकड़ रहा है। वह सरदार से बोला, “मैं आपसे ही दो हाथ करूंगा, लेकिन मैं कुश्ती के पेंच वगैरा कुछ नहीं जानता।”

सरदार ने कहा, “कोई हर्ज नहीं, मैं सैकड़ों को लड़ाता हूं, पेंच सिखाता हूं, तुम्हें भी सिखा दूंगा।”

अखाड़े में उतरकर पहलवान तो ताल ठोंकने में लगा और इस नवयुवक ने झपटकर उसकी कमर दोनों हाथों से पकड़ी, उसे अपने सिर के ऊपर उठा लिया और लगा घुमाने ऊपर ही ऊपर। सरदार के चेले चिल्लाए, “गुरुजी, लंगी (लंगड़िया-एक पेंच) लगाओ।”

गुरुजी ने कहा, “अरे, पैर जमीन पर आयें तब तो, यह तो यों ही आसमान दिखा रहा है। इसमें लंगी की गुंजाइश कहां है?”

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