Hindi Essay on “Nar Ho na Nirash karo man ko”, “नर हो, न निराश करो मन को”, for Class 10, Class 12 ,B.A Students and Competitive Examinations.

नर हो, न निराश करो मन को

Nar Ho na Nirash karo man ko 

  • नर का अर्थ मुक्ति का उद्देश्य सफलता की पहली सीढ़ी : निराशा का त्याग

साधारण अर्थ में ‘नर’ और ‘आदमी’ का एक ही अर्थ है, पर जब ‘नर’ शब्द का प्रयोग विशेषण के तौर पर किया जाता है, तो इसका अर्थ है, सर्वश्रेष्ठ प्राणी। कवि हम से कहना चाहता है-आप मनुष्य हो । इस कारण। वीर, साहसी, बुद्धिमान और कर्मशील भी हो। ठीक है, अपना कर्म करने पर भी इस बार तुम्हें सफलता नहीं मिल सकी, पूरा परिश्रम करके भी मनचाहा फल नहीं पा सके, जो चाहते थे, वह नहीं कर पाए। फिर भी इससे निराश होने की क्या बात है?

 

जीवन पथ के शूलों पर चल जो नर आगे चलता है।

वही पुरुष जीवन रस पाता, भाग्य उसी का फलता है।।

मनुष्य सृष्टि का सबसे श्रेष्ठ प्राणी है। इस श्रेष्ठता का आधार यही है कि उसके पास सोचने-विचारने के लिए बुधि है। भावना, कल्पना और दृढ़ता के लिए मन है। सुख-दुख के क्षणिक भावों से ऊपर उठकर आनंद में । लीन रहने वाली जागृत आत्मा है। जीवन है, तो उसके साथ हार-जीत की कहानियाँ भी जुड़ी हैं। बीमारियाँ और | दुर्घटनाएँ भी पीड़ित तथा परेशान करती ही रहती हैं परंतु इन सबका अर्थ यह तो नहीं है कि निराश होकर बैठ जाओ और कर्तव्यों का पालन करना छोड़ दो। सदियों का इतिहास बताता है कि निराशा त्यागकर मनुष्य ने जब जो । कुछ चाहा, वह उसे अवश्य मिला। इसलिए यदि किसी कारणवश तुम सफलता नहीं पा सके, तो कोई बात नहीं। अभी भी निराशा छोड़कर कर्मपथ पर डट जाओ। सफलता अवश्य मिलेगी। नर हो तो निराशा छोड़ो, आशा को मन  में धारण करो।

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