Hindi Bharat ki Aatma “हिंदी भारत की आत्मा” Hindi Essay 500 Words, Best Essay, Paragraph, Anuched for Class 8, 9, 10, 12 Students.

हिंदी भारत की आत्मा

Hindi Bharat ki Aatma 

 

राष्ट्रभाषा हिंदी राष्ट्र की आत्मा है। यह भारत की आत्मा की धुरी है। भारत की संस्कृति और सभ्यता की मल चेतना को सुक्ष्मता से यही अभिव्यक्त करती है। राष्ट्रीय विचारों की यह कोश है। यह भारतीय आत्मा की प्रतीक है। स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण के समय हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया। इसके लिए अनेक देशभक्तों ने संघर्ष किया। स्वतंत्रता से पूर्व हिंदी के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करने वाले राजनेता राजनीति के दल में फंस गए।

परिणामतः संविधान के अनुच्छेद 343 में लिखा गया है। संघ की सरकारी भाषा देवनागरी लिपि हिंदी होगी और संघ के सरकारी प्रयोजनों के लिए भारतीय अंकों का अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व होगा। किंतु अधिनियम के खंड (2) में लिखा गया, ‘इस संविधान के लागू होने के समय से पन्द्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का प्रयोग होता रहेगा, जिसके लिए इसके लागू होने से तुरन्त पूर्व होता था।’ संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा माना जाता। अंग्रेजी के सहयोग की बात करनी हो नहीं चाहिए थी। कारण यह है कि राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा है। हमारे साथ स्वतंत्र हुए पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा उर्दूह, तुर्की में तुर्की राष्ट्रभाषा है। इसके अतिरिक्त अनेक देशों में अपने देश की राष्ट्रभाषा घोषित हो चुकी है पर जिस तरह की शर्त भारत महिदी के संबंध में लगाई गई है, ऐसी किसी देश में नहीं है। राजभाषा अधिनियम 1963 के अन्तर्गत हिंदी के साथ अग्रजा के प्रयोग को सदेव के लिए प्रयोगशील बना दिया। संसद में हिंदी के साथ अंग्रेजी को अनुमति मिल गई। यह भी कहा गया कि जब तक भारत का एक भी राज्य हिंदी का विरोध करेगा तब तक हिंदी को राष्ट्रभाषा के सिंहासन पर सिंहासनारूढ नहीं होने दिया जाएगा। सेठ गोविन्ददास ने इसका विरोध किया। उन्होंने राजभाषा के इस अधिनियम के विरुद्ध मत दिया। स्वतंत्र भारत में अग्रजा का माह अंग्रेजी भाषा को विशाल ज्ञान का वातायन बताया गया है पर अगर गौर से देखा जाए तो हिंदी अंग्रेजी के स्थान पर पूरी तरह सक्षमता के साथ खडी है। भारत में अंग्रेजी के मोह का कारण यह रहा कि देश की राजकीय कार्य व्यवस्था अंग्रेजी में संचालित थी। अत: अंग्रेजी मानसिकता का वर्चस्व था। वे दैनिक व्यवहार में हिंदी अपनाने को तैयार नहीं थे। सरकारी कार्यालयों के अधि कारी से लेकर बाब तक अंग्रेजी में काम छोड़ने को तैयार नहीं थे। दसरा कारण यह था कि देश संचालन के प्रमुख पदों पर अहिंदी भाषियों का अधिकार था। उन्हें हिंदी व भारतीय जीवन पद्धति से नफरत थी। तीसरा कारण यह था कि राजनीतिका को हिंदी संचालन से उत्तर दक्षिण का बंटवारा दिखाई देने लगा और चौथा कारण यह था कि नेहरू ने मृत्यु पूर्व कह दिया कि जब तक भारत का एक भी राज्य हिंदी का विरोध करेगा तब तक अंग्रेजी रहेगी। इससे अंग्रेजी का मोह नस-नस में व्याप्त हो गया। राजकीय स्तर पर अंग्रेजी के का प्रचार किया जाने लगा। इसके बावजूद भारत में अंग्रेजी दो-तीन फीसद से ज्यादा नहीं जानते। अंग्रेजी के हिमायती भी जब जनता के सामने वोट माँगने आते हैं तब हिंदी में माँगते हैं। उन्हें मालूम है कि अंग्रेजी में जनता को उनकी बात नहीं समुझेगी। आज तो हिंदी तेजी से बढ़ रही है। अंग्रेजी विज्ञापन हिंदी में देते हैं। हिंदी आज परीक्षा का माध्यम है। यह अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं का माध्यम बनती जा रही है। हिंदी का भविष्य निश्चित रूप से प्रगतिशील है।

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